इतिहास की किताबों के मुताबिक, यह ज़ियारत शिया हदीस की मशहूर किताबों जैसे 'मज़ार-ए-कबीर' और 'बिहारुल अनवार' में दर्ज है। यह ज़ियारत दो रूपों में मिलती है:

मैंने आपके शरीर पर लगे अनगिनत जख्मों की कल्पना की है।

ज़ियारत-ए-नाहिया (Ziyarat-e-Nahiya) एक प्रसिद्ध ज़ियारत है जो इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के शोक में पढ़ी जाती है। इस लेख में हम इस ज़ियारत का महत्व, उसका पाठ और उसकी विशेषताओं को हिंदी में समझने का प्रयास करेंगे।

इस ज़ियारत में सिर्फ़ इमाम हुसैन (अ) ही नहीं, बल्कि कर्बला के अन्य सभी शहीदों जैसे हज़रत अब्बास, हज़रत अली अकबर, हज़रत अली असग़र और वफ़ादार साथियों के नामों का सिलसिलेवार ज़िक्र है और उन पर सलाम भेजा गया है।

इस ज़ियारत का सबसे भावुक हिस्सा वह है जहाँ कर्बला की घटनाओं को विस्तार से याद किया जाता है。इसमें इमाम हुसैन (अ.) की प्यास, उनके मासूम बच्चों के कष्ट, और आशूरा के दिन ज़ुल्म के उन दृश्यों का वर्णन है जिसने आसमान और ज़मीन को भी हिला दिया था。इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे पैगंबर (स.) के नवासे को भूखा-प्यासा शहीद किया गया。

जो अमूमन अशूरा के दिन या मुहर्रम के महीने में पढ़ी जाती है।

अंजुमनों और मातमदारों के लिए हिंदी लिपि में ज़ियारत को पढ़ना और याद करना आसान हो जाता है।

ज़ियारत-ए-नाहिया: महफ़ूज़ इबादत और इसका गहरा रूहानी महत्व

इसकी शुरुआत आदम (अ.स.) से लेकर पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.व.) तक के सभी महान नबियों को सलाम भेजने से होती है। यह इमाम हुसैन को उन सभी के दैवीय मिशन का उत्तराधिकारी (वारिस) सिद्ध करता है।

मोहर्रम के महीने में पढ़ी जाने वाली अन्य की जानकारी प्राप्त करने में।